स्वतंत्रता आन्दोलन में मध्यप्रदेश का योगदान।

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स्वतंत्रता आन्दोलन में मध्यप्रदेश का योगदान।

ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन के साथ मध्य प्रदेश के इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। पेशवा बाजीराव ने उत्तर भारत को जीतने की योजना बनाई। इसी समय छत्रसाल ने मुगल सूबेदार बंगश से टक्कर होने पर पेशवा बाजीराव को सहायतार्थ बुलाया। दोनों ने मिलकर बंगश को पराजित किया।

छत्रसाल ने पेशवा बाजीराव को दमोह, सागर, शाहगढ़, धामोनी, खिमलासा, गुना तथा ग्वालियर के क्षेत्र प्रदान किए। गढ़ मंडला में गौड़ शासक राजा नरहरि शाह का शासन था। अप्पा साहब मोरे तथा बापूजी नारायण के नेतृत्व में मराठों ने
उसे पराजित किया। इस समय अंग्रेज भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने में लगे हुए थे। मराठों की आंतरिक कलह से अंग्रेजों को हस्तक्षेप करने का मौका मिला। उन्होंने 1818 में पेशवा को हटाकर रघुजी भोंसले से जबलपुर और सागर का क्षेत्र छीन
लिया। कर अप्पा साहब को हटाकर नागपुर एवं नर्मदा के उत्तर का समस्त क्षेत्र मराठों से छीन लिया। सहायक संधि के बहाने अंग्रेज बरार को पहले ही ले चुके थे। अतः अंग्रेजों ने मध्य प्रांत तथा बरार को मिला-जुला प्रांत बनाया। छत्रसाल की मृत्यु के पश्चात् विंध्य प्रदेश, रीवा, पन्ना, जयगढ़, बिजावर, नागौद इत्यादि छोटी-छोटी रियासतों में बंट गया।


अलग-अलग संधियों के द्वारा इन रियासतों को ब्रिटिश साम्राज्य के संरक्षण में ले लिया गया। 1722-23 ई. में बाजीराव ने मालवा पर हमला किया तथा उसे लूट लिया


मालवा का क्षेत्र पवार तथा मल्हार राव होल्कर के बीच बंट गया। बुरहानपुर से ग्वालियर तक का क्षेत्र पेशवा द्वारा सिंधिया को प्रदान किया गया।


सिंधिया द्वारा उज्जैन तथा मंदसौर तक का क्षेत्र अपने अधिकार में लिया गया। अंततः मालवा मराठों के तीन प्रमुख सरदारों जैसे सिंधिया (खंडवा, बुरहानपुर, हरदा, टिमटनी, उज्जैन, मंदसौर व ग्वालियर), होल्कर (निमाड़ से रामपुर भानपुरा तक) तथा पवार (धार एवं देवास) के अधीन हो गया। मराठे भोपाल को भी जीतना चाहते थे।
निजाम ने मराठों को रोकने के लिए एक योजना बनाई, लेकिन बाजीराव ने शीघ्रता से भोपाल पर आक्रमण किया और उससे सीहोर, होशंगाबाद का क्षेत्र अपने अधीन कर लिया। उसने 1737 में भोपाल के युद्ध में निजाम को पराजित किया। निजाम
तथा मराठों के मध्य संधि हुई। निजाम ने नर्मदा-चम्बल क्षेत्र के मध्य के सारे भाग पर मराठों का आधिपत्य स्वीकार कर लिया।


मराठों के प्रभाव के पश्चात् एक अफगान सरदार दोस्त मोहम्मद खां ने भोपाल में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। पेशवा बाजीराव द्वितीय के काल में मराठा संघ में फूट पड़ी। अंग्रेजों द्वारा इसका लाभ उठाया गया। अंग्रेजों ने सिंधिया से पूर्वी निमाड़ और हरदा-टिमटनी छीन लिया तथा मध्य प्रांत
में मिला लिया। मालवा को कई रियासतों में बांट दिया गया।


इन रियासतों पर प्रभावी नियंत्रण हेतु सैनिक छावनियां स्थापित की गई।


 सन् 1857 का विद्रोह


1857 की क्रांति में मध्य प्रदेश का महत्वपूर्ण स्थान था। 10 मई, 1857 में मेरठ में सैनिकों द्वारा विद्रोह किया गया। इस विद्रोह की आग मध्य प्रदेश तक फैल गई। 3 जून, 1857 को मध्य प्रदेश में क्रमशः नीमच, मंदसौर तथा ग्वालियर में विद्रोह हुआ। जुलाई, 1857 में शिवपुरी, इंदौर, महू तथा सागर में विप्लव फैल गया। 14 जून, 1857 तथा 20 जून, 1857 में क्रमशः मुरार छावनी तथा शिवपुरी में विद्रोह
आरंभ हुआ। जुलाई, 1857 में अमझेटा, सरदार खुरा तथा भोपावार में विद्रोह प्रारंभ हुआ। अगस्त 1857 में सागर तथा नर्मदा घाटी के समस्त प्रदेशों में असैनिक विद्रोह प्रारंभ हुआ। ग्वालियर में झांसी की रानी तथा तात्या टोपे ने विद्रोह की कमान संभाल
ली। अंततः अंग्रेजों ने 28 जून, 1858 में अंग्रेजों द्वारा इन दोनों को संयुक्त सेना को पराजित किया गया।


इस युद्ध में झांसी की रानी वीरगति को प्राप्त हो गई, लेकिन तात्या टोपे बच निकले। कुछ समय पश्चात् तात्या टोपे को सिंधिया के सामंतों द्वारा पकड़ लिया गया और उन्हें अंग्रेजों के हाथों में सौंप दिया गया। अंग्रेजों ने तात्या टोपे को शिवपुरी
में फांसी दे दी।


3 जून, 1857 ई. में नीमच के सैनिकों द्वारा वहां की
छावनी में आग लगा दी गई। 14 जून, 1857 को ग्वालियर के समीप मुरार छावनी में सैनिक विद्रोह आरंभ हुआ। ग्वालियर तथा शिवपुरी के मध्य सैनिकों द्वारा संचार व्यवस्था को नष्ट कर दिया गया, जिससे संपर्क लाइन बाधित हो गई। 20 जून, 1857 में जब शिवपुरी में विद्रोह भड़का तो अंग्रेज अधिकारियों को गुना छोड़कर भागना पड़ा।
बुन्देलखंड के स्थानीय सैनिकों ने भी विद्रोह कर दिया।


जुलाई, 1867 ई. में सादात खां के नेतृत्व में इंदौर जा रही सेना पर विद्रोहियों द्वारा हमला किया गया। अंग्रेजी सेना को असफलता हाथ लगी। हालांकि सभी अंग्रेजी अधिकारी इंदौर में ही मौजूद थे, लेकिन विद्रोहियों के आक्रामक रुख के कारण वे
अपने परिवारों के साथ सीहोर चले गए।


  1857 और उसके पूर्व के प्रमुख विद्रोही एवं स्थल

महू में भी जुलाई 1857 में विरोध प्रारंभ हुआ तथा सैनिकों ने  भी इसमें भरपूर साथ दिया। इस समय दिल्ली के शहजादे हुमायूं द्वारा मंदसौर जाकर मेवाती, सिंधिया तथा बनावली सेना के कुछ सैनिकों की सहायता से एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की, जो फिरोजशाही के नाम से मंदसौर का राजा बन गया।

मंडलेश्वर की सेना की टुकड़ी ने सेंट्रल जेल पर हमला बोल दिया। यहां पर भीमा नायक नामक एक आदिवासी के नेतृत्व में भी विद्रोह हुए। इसके अतिरिक्त मंडला जिले में रामगढ़ रियासत की अवंतीबाई ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध किया।
उसने मंडला की सीमा पर खेड़ी गांव में अपना मोर्चा स्थापित किया एवं सेनापति वार्डन को क्षमा मांगनी पड़ी। रानी अवंतीबाई ने रामगढ़ के तहसीलदार पर हमला कर दिया।


तीन माह के कड़े संघर्ष के पश्चात् रानी रामगढ़ छोड़कर देवहारगढ़ के जंगल की ओर चली गई। अंग्रेजों ने उसका जंगल में पीछा किया। जंगल में दोनों के मध्य युद्ध प्रारंभ हुआ। जब रानी को यह लगा कि वह पकड़ी जा सकती है, तो उसने आत्महत्या कर ली।


  स्वतंत्रता आंदोलन


भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन 1885 ई. में मुंबई में किया गया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने लोगों में राष्ट्रीय चेतना जगाने का प्रयास किया। इसी बीच खंडवा ने 'सुबोध सिन्धु' व जबलपुर से 'जबलपुर टाइम्स' का प्रकाशन प्रारंभ किया गया।
पंडित माखनलाल चतुर्वेदी ने अपने पत्र 'कर्मवीर' के
माध्यम से इसके प्रचार में नई दिशा दी। 1907 में जबलपुर में एक क्रांतिकारी दल का गठन किया गया। 1923 में जबलपुर में सत्याग्रह देवदास गांधी, राजगोपालाचार्य तथा डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया। जबलपुर के सेठ गोविंद दास व पंडित द्वारिका प्रसाद
मिश्र के नेतृत्व में 6 अप्रैल, 1930 को 'नमक सत्याग्रह' की शुरुआत की गई। इसी वर्ष में 'जंगल सत्याग्रह' का आरंभ हुआ।


1916 ई. में राज्य के सिवनी जिले में स्वतंत्रता आंदोलन आरंभ हुआ। 1922 ई. में भोपाल रियासत के सीहोर क्षेत्र में कोतवाली के सामने विदेशी फेल्ट केप की होली दिखाई दी। 1938 ई. में भोपाल में भोपाल राज्य प्रजामंडल की स्थापना की गई। इसमें मौलाना तरजी मशरिकी को सदर व चतुर नारायण
मालवीय को मंत्री के रूप में चुना गया।


बैतूल जिले के घोड़ा-डोंगरी के आदिवासियों ने भी नमक आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1930 ई. में हुए जंगल सत्याग्रह का नेतृत्व शाहपुर के निकट स्थित बंजारी सिंह कोरकू द्वारा किया गया। रतलाम में 1920 ई. में कांग्रेस कमेटी की स्थापना की गई। इसके प्रथम अध्यक्ष के रूप में मोहम्मद उमर खान को नामित किया गया।
यहां राष्ट्रीय आंदोलन का सूत्रपात स्वामी ज्ञानानंद की प्रेरणा से हुआ। यहां पर 1931 ई. में 'स्त्री सेवादल' तथा 1935 ई. में 'प्रज्ञा परिषद' की स्थापना की गई।


1934 ई. में झाबुआ जिले में प्रजामंडल की सहायता से विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, शराबबंदी व hरिजन उद्धार संबंधी आंदोलन प्रारंभ किए गए।
अंग्रेजी सेना द्वारा इन स्वतंत्रता सेनानियों पर हमला किया गया तथा इन्हें कारागार में डालकर कष्टप्रद यातनाएं दी गईं।


इसी समय भोपाल राज्य हिंदू सभा की नींव डाली गई। इसका नेतृत्व भोपाल रियासत में मास्टर लाल सिंह, लक्ष्मी नारायण सिंघल, डॉ. जमुना प्रसाद मुखरैया, पं. उद्धव दास मेहता, पं. चतुर नारायण मालवीय ने किया। इसके अतिरिक्त भोपाल रियासत में 'अन्जुमन खुद्दामे वतन' का नेतृत्व मौलाना
तर्जी मशरिकी खान व शाकिर अली खान ने किया।
मंडलेश्वर जेल में बंद क्रांतिकारियों ने 2 अक्टूबर, 1942 को जेल के मुख्य द्वार का ताला तोड़कर विद्रोह किया। हालांकि इन्हें अंग्रेजी सेना द्वारा पुनः पकड़ लिया गया। जनवरी, 1939 में त्रिपुरी नामक स्थान पर राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन संपन्न
हुआ। यहां पर सुभाष चंद्र बोस को इसका अध्यक्ष चुना गया।


हालांकि उन्होंने अप्रैल, 1939 में इस्तीफा दे दिया।
15 अगस्त, 1947 ई. को भारत स्वतंत्र हुआ, तब मध्य भारत व उसके अंतर्गत सभी रियासतों को मिलाकर मध्य प्रदेश नामक राज्य बना। 



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